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तेरह घंटे काम किया पर सिर्फ पाँच घंटे काम आए

एक मालिक सुबह नौ से रात दस तक। तेरह घंटे। पर उनमें दो घंटे सजावट ठीक करने में गए जो कोई और कर सकता था। डेढ़ घंटा किसी आपूर्तिकर्ता से बेनतीजा बहस में जहाँ कुछ निकला नहीं। एक घंटा ऐसे आगंतुक को दिया जो बस देखने आया था, खरीदने का कोई इरादा नहीं। तेरह में

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बच्चे की आँखों की चमक और तीन महीने की ठंडी बिक्री

मार्च का महीना। बिक्री तीन महीने से ठंडी। किस्त, तनख्वाह, बिजली, सब जमा। एक रात लगा। बंद करके कहीं नौकरी ढूँढ लूँ। क्या फायदा रोज़ शटर उठाने का जब जेब में कुछ बचता ही नहीं। सुबह बच्चे ने पूछा। “पापा, आज दुकान चलोगे? मुझे वो नया स्पीकर दिखाना है दोस्तों को।” उसकी आँखों की चमक

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पाँच मिनट की बातचीत जो चार सौ रुपये ज़्यादा दिलाती है

एक औरत अकेली आई। मिक्सर देखने। काम करने वाले ने दो मॉडल रखे, दाम बताया, और बैठकर फोन उठा लिया। उसने पूछा। “इसमें चटनी वाला जार अलग से आएगा?” जवाब मिला। “हाँ, बाहर मिलता है।” कोई बारीकी नहीं। कोई दिलचस्पी नहीं। उसकी तरफ दोबारा देखा तक नहीं। वो उठकर सामने वाली दुकान गई। वहाँ किसी

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काउंटर पर तीस सेकंड की चुप्पी कैसे तीन कूलर का नुकसान करा देती है: नसरुद्दीन नरसीदानी तुलना, प्रतिस्पर्धा और टिकाऊ सफलता के बारे में बताते हैं

भारतीय रिटेल के बहुत से दुकानदार एक ख़ास जाल में फँसते हैं बिना यह पहचाने कि यह जाल है। वो प्रतिस्पर्धी की भरी दुकान देखते हैं और सीने में कुछ हिलता है। अपनी बिलिंग की तुलना उससे करते हैं जो उन्हें लगता है कि प्रतिस्पर्धी कर रहा है। अपने फ़ैसले इस आधार पर बदलते हैं

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जो ग्राहक शिकायत नहीं करता वो सबसे ज़्यादा नुकसान करता है

एक बात जो नसरुद्दीन नरसीदानी तीस साल के अनुभव से सीखी है। बोलने वाला ग्राहक दुश्मन नहीं है। जो शिकायत करता है वो कम से कम मौका दे रहा है। “ठीक करो, मैं रुकूँगा।” असली नुकसान वो करता है जो बिना आवाज़ के निकल जाता है। न चिल्लाता है, न भिड़ता है, न कोई राय

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