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2024 Legal Overhaul: What Every Indian Woman Must Know

There are moments when the ground shifts beneath a person’s feet without anyone announcing that it has happened. On July 1, 2024, India’s criminal law underwent exactly this kind of quiet seismic shift. Three codes that had governed criminal law since the British colonial era were replaced simultaneously. The Indian Penal Code of 1860, the […]

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Why I Wrote The Reality of Society in Buddhism By Dr Gobinda Chandra Behera

A child does not learn belief through explanation. Belief simply enters, quietly, long before language is ready to question it. I have spent more than a decade as an artist, watching people, expressions, gestures and the small unnoticed patterns of everyday life. Somewhere in that long practice of looking, I began to notice something else:

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काउंटर के तीस साल: नसरुद्दीन नरसीदानी का नौ सूत्री ढाँचा जो किसी भी रिटेल दुकान को मशीन की तरह चला सकता है

रिटेल में एक साथ कई मोर्चे खुले रहते हैं। स्टॉक संभालो, ग्राहक देखो, स्टाफ़ को दिशा दो, बिलिंग करो, डिलीवरी पहुँचाओ, शिकायतें सुलझाओ। और ऊपर से अगले सीज़न की तैयारी पहले से ही शुरू हो जानी चाहिए। नसरुद्दीन नरसीदानी जो “बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल” के लेखक हैं, ने तीस साल इसी उलझन में बिताए।

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वह साठ सेकंड जो दुकान की पूरी दिशा बदल सकते हैं

साठ सेकंड काफी होते हैं किसी एक बात को साफ करने के लिए। जब नसरुद्दीन नरसीदानी अपनी किताब बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल में बताते हैं कि हर ग्राहक दुकान में कदम रखते ही तीस सेकंड में फैसला कर लेता है कि रुकना है या नहीं, तो वह कोई सिद्धांत नहीं दे रहे। वह तीस

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शांत मन का अर्जुन: प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू बताते हैं कि असली लड़ाई बाहर नहीं, अंदर होती 

अर्जुन एक सफर पर था।  गाँव से कस्बा। कस्बे से शहर। शहर से पुणे। और पुणे की धरती पर एक ऐसा आसमान था जो पहले कभी इतना बड़ा नहीं लगा था।  लेकिन फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद का असली चरमोत्कर्ष कोई शहर नहीं है। कोई उपाधि नहीं है। कोई पद नहीं है। इस पुस्तक

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वह बनियान जो वापस ले ली गई: प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू की पुस्तक में वह दर्द जो हम सबने कभी न कभी जिया है

सात महीने।  सिर्फ सात महीने अर्जुन अपने चाचा के घर में रहा था जब उन्होंने उसे पहली बार पढ़ाई के लिए शहर भेजा था। वह सात महीने सीखने के भी थे और तोड़ने के भी।  चाचा के घर रहते हुए अर्जुन मसाला पीसता, कपड़े धोता, बाज़ार के सारे काम करता। इसलिए नहीं कि कोई नियम था, बल्कि इसलिए

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वह ताने जो रात को छत पर साथ आते थे: अपमान को शक्ति में बदलने का प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू का तरीका

कुछ ताने इतने गहरे उतर जाते हैं कि वह एक इंसान की सोच का हिस्सा बन जाते हैं।  इससे कुछ नहीं होगा।  रात को जब अर्जुन अकेला छत पर लेटा और आसमान को देखता, तो रिश्तेदारों की वही आवाज़ें हवा में तैरते हुए फिर से उसके कानों तक पहुँच जाती थीं। तारे चमकते रहते, लेकिन उसकी आँखों

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गरीब बाप के हाथ की दरारें और उनके बेटे की किताबें: प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू की फैलहा का सबसे दर्दनाक सच 

कुछ चीज़ें होती हैं जो इंसान कभी नहीं भूलता।  वह रात जब माँ ने खुद का हिस्सा खाना अर्जुन की थाली में डाल दिया और कह दिया कि मुझे भूख नहीं है। वह चीख जो कभी नहीं निकली। वह आँसू जो खाने के साथ नीचे उतर गए।  प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू ने अपनी पुस्तक फैलहा: हार

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