कुछ ताने इतने गहरे उतर जाते हैं कि वह एक इंसान की सोच का हिस्सा बन जाते हैं।
इससे कुछ नहीं होगा।
रात को जब अर्जुन अकेला छत पर लेटा और आसमान को देखता, तो रिश्तेदारों की वही आवाज़ें हवा में तैरते हुए फिर से उसके कानों तक पहुँच जाती थीं। तारे चमकते रहते, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ आँसू भरा रहता। उसे लगता जैसे पूरा आसमान भी उसके खिलाफ फैसले में शामिल है और हर चमकता तारा यही कह रहा है, इससे कुछ नहीं होगा।
धीरे-धीरे यह वाक्य उसके भीतर गहराई तक उतर गया। अब जब वह पढ़ाई करने बैठता, तो पुस्तक के शब्द धुँधले पड़ जाते और मन में वही आवाज़ गूँजती, तू चाहे जितना कर ले, इससे कुछ नहीं होगा।
प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू की फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद का सबसे शक्तिशाली हिस्सा वही है जब पाठक देखता है कि कैसे ताने एक इंसान को तोड़ भी सकते हैं और उस टूटने की जगह से ही कुछ नया बना भी सकते हैं।
कक्षा में वह पल जो कोई नहीं भूलता:
शिक्षक की आवाज़ गूँजती, अर्जुन, सवाल का जवाब दो। वह खड़ा होता। हाथ काँपते। दिमाग खाली। श्यामपट्ट की तरफ देखते हुए लगता जैसे सारे अक्षर मिलकर उसका मज़ाक उड़ा रहे हों।
इतना भी नहीं आता।
कक्षा के बच्चे धीरे से मुस्कुराते। कोई कोहनी मारकर दूसरे को देखता। और अर्जुन के कानों में वह हँसी किसी तेज़ धातु के रगड़ने जैसी लगती।
कभी-कभी वह सवाल का जवाब जानता भी था। लेकिन जैसे ही सबकी नज़रें उस पर टिकतीं, शब्द गले में अटक जाते। टूटी-फूटी आवाज़ निकली। शिक्षक ने कहा, बैठ जाओ, बेकार में समय खराब कर रहा है। उस वक्त उसका सिर झुक जाता, लेकिन भीतर कुछ ऐसा टूटता जो फिर कभी जुड़ नहीं सका।
लेकिन उसी टूट से एक ज़िद भी जन्म लेती थी।
वह रात जब उसने अपने आप से वादा किया:
परीक्षा के परिणाम बहुत खराब आए थे। पिता ने आँगन में सबके सामने अपमानित किया। अर्जुन चुपचाप छत पर जाकर बैठ गया। आसमान में बादल उमड़ रहे थे, हवा में अजीब-सी नमी थी।
उस सन्नाटे में उसने धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ भींचीं और खुद से वादा किया, अगर आज हार मान लूँगा, तो यह सब बातें मेरी किस्मत बन जाएँगी। नहीं, मुझे इन्हें तोड़ना होगा।
वह रात पहली बार उसने तय किया कि चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, वह पूरी रात पुस्तकों के साथ जागेगा। शब्द भले ही पूरी तरह समझ में न आएँ, लेकिन उसी रात उसे एहसास हुआ कि उसके भीतर हार मान लेने वाला नहीं, लड़ने वाला इंसान भी छुपा है।
तानों को उर्वरक में बदलना:
रिश्तेदारों की बातें जो पहले सिर्फ चोट करती थीं, अब उनके भीतर किसी अजीब-से संकल्प की खाद बनती जा रही थीं। जब कोई कहता, इससे कुछ नहीं होगा, तो उसे बुरा तो लगता, लेकिन अब मन ही मन वह सोचता, यही लोग कल मेरे बारे में कहेंगे, हमने इसे कभी नहीं समझा।
कभी-कभी वह आईने के सामने देर तक खड़ा होकर खुद को देखता। चेहरे पर थकान होती, आँखों में आँसू भी तैरते, लेकिन उसी थके और भीगे चेहरे में वह एक और चेहरा देखने की कोशिश करता, एक ऐसा चेहरा जिसमें आत्मविश्वास की चमक हो, जिसमें अपमान के दाग मिट गए हों। और आईने के सामने खड़ा होकर वह खुद से कहता, आज मैं हारा हुआ दिख रहा हूँ, लेकिन कल यही चेहरा बदल जाएगा।
यही ज़िद, यही अकेला वादा, यही रात की छत पर की गई कसम, वह चिंगारी थी जो बाद में एक प्राध्यापक की पीएचडी बन गई।
फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और देखें कैसे अपमान को उसकी बात का जवाब देने की शक्ति में बदला जाता है।


