सात महीने।
सिर्फ सात महीने अर्जुन अपने चाचा के घर में रहा था जब उन्होंने उसे पहली बार पढ़ाई के लिए शहर भेजा था। वह सात महीने सीखने के भी थे और तोड़ने के भी।
चाचा के घर रहते हुए अर्जुन मसाला पीसता, कपड़े धोता, बाज़ार के सारे काम करता। इसलिए नहीं कि कोई नियम था, बल्कि इसलिए कि उसके पिता आर्थिक रूप से कमज़ोर थे और उसका खर्चा देने की सामर्थ्य नहीं थी। तो वह काम ही उसका किराया था।
सात महीने बाद जब घर में झगड़ा हुआ और उसे वापस गाँव जाना पड़ा, तो चाचा ने उसे कुछ दिन पहले दिलाई हुई बनियान वापस उतरवा ली।
एक बनियान।
प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू ने फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद में इस पल को किसी नैतिक उपदेश के रूप में नहीं लिखा। उन्होंने इसे बिल्कुल सीधा लिखा है। उसी सीधेपन में एक चीख है जो हर वह इंसान सुनना चाहता है जिसने कभी किसी के आगे हाथ फैलाया हो।
वह सीख जो उस घर ने दी:
शहर में चाचा के साथ रहते हुए इन सात महीनों में अर्जुन ने एक बात अच्छी तरह समझ ली। चाहे माता-पिता की परिस्थिति कितनी भी कमज़ोर क्यों न हो, और चाहे वह अपने बच्चे के अत्यधिक सफल होने की कितनी ही इच्छा क्यों न रखें, फिर भी बच्चे को अपने पास ही रखना चाहिए। वरना कभी-कभी अधिक भलाई और अधिक सफलता की चाह में किए गए फैसले उल्टे पड़ जाते हैं।
यह पंक्ति पूरी पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है। और इसका जन्म बनियान उतरवाने के उस दर्द से हुआ।
वे दो पंक्तियाँ जो प्रो. राजू की पूरी सोच हैं:
असफलता, सफल व्यक्तियों के लिए प्रथम प्रयास होती है, जबकि असफल व्यक्तियों के लिए वही अंतिम परिणाम बन जाती है।
परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, वास्तविक विजेता वही होता है जो हार मानने से इनकार करता है।
यह दो पंक्तियाँ किसी और की कही हुई बातें नहीं हैं। यह उस आदमी ने लिखी हैं जिसे खुद दुनिया ने फैलहा कहा, जिसे कुंडली में भी असफल लिख दिया गया, जिस पर ताने बरसे, जिसको बनियान तक वापस लेनी पड़ी। और जो फिर भी पीएचडी करके, ग्यारह देशों की यात्रा करके, एक विभागाध्यक्ष बन गया।
वे लोग जिनके लिए फैलहा लिखी गई है:
यह पुस्तक उन सबके लिए है जो पहली बार अपने घर से बाहर गए, किसी रिश्तेदार के यहाँ रहे, कुछ पलों में गहराई से खुशी महसूस की और फिर कुछ पलों में इतनी नीचाई देखी जो उन्होंने सोची भी नहीं थी।
यह उन माँ-बाप के लिए भी है जो हर बार यह सोचते हैं कि अपना बच्चा दूसरे के यहाँ ज़्यादा तरक्की कर पाएगा। कभी-कभी बच्चे को अपने पास रखना ही सबसे बड़ी सफलता की बुनियाद होती है।
और यह उन सब पाठकों के लिए है जो जान भी लेते हैं कि दुनिया हमेशा न्यायसंगत नहीं है, लेकिन फिर भी सुबह उठकर कोशिश करते हैं।
फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और देखें कि एक छोटी-सी ज़िद इंसान को कहाँ से कहाँ ले जाती है।


