कुछ चीज़ें होती हैं जो इंसान कभी नहीं भूलता।
वह रात जब माँ ने खुद का हिस्सा खाना अर्जुन की थाली में डाल दिया और कह दिया कि मुझे भूख नहीं है। वह चीख जो कभी नहीं निकली। वह आँसू जो खाने के साथ नीचे उतर गए।
प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू ने अपनी पुस्तक फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद में गरीबी को किसी विचार की तरह नहीं, बल्कि जिए हुए यथार्थ की तरह लिखा है। वह गरीबी जो सिर्फ जेब खाली नहीं करती, बल्कि आत्म-सम्मान को भी धीरे-धीरे घिस देती है। वह गरीबी जो एक बाप के हाथ की दरारों में दिखाई देती है। वह गरीबी जो एक माँ की मुस्कान में छुपी रहती है जब वह जली हुई रोटी बच्चे को देती है और कहती है, आज यह तुम्हारे हिस्से में।
वह चप्पलें जो तीन बार टूट गई थीं:
अर्जुन को पहली चप्पलें दसवीं कक्षा में मिलीं। पायजामा ग्यारहवीं में। पूरी पेंट बारहवीं में।
यह सिर्फ कपड़ों की बात नहीं है। यह उन वर्षों की बात है जब विद्यालय के रास्ते में पाँव मिट्टी में धँस जाते थे और चप्पलें गली में छूट जाती थीं। साथी पूछ लेते, तेरी चप्पल फिर टूट गई। और अर्जुन हँसकर कह देता, हाँ इसे भी छुट्टी चाहिए। लेकिन वह हँस नहीं रहा होता। वह सिर्फ अपनी तकलीफ को छुपाने का एक तरीका जानता था।
जिस बच्चे के पास एक भी रंगबिरंगी पेंसिल नहीं थी, वह दूसरों की नई पुस्तकें देखता था और अपनी पुरानी, झुर्रियों वाली कॉपी को सबसे कीमती समझता था। इसलिए नहीं कि वह सुंदर थी। इसलिए कि उसमें माँ की सिलाई और बाप की मेहनत दोनों के निशान थे।
बाप का वह चेहरा जो बेटा किसी पुस्तक से नहीं, खेत से सीखा था:
अर्जुन के पिताजी खेत से थके-हारे लौटते। कपड़ों पर मिट्टी और थकान एक साथ लिपटी रहती। कंधे झुके रहते। चेहरे पर ऐसी लकीरें रहतीं जिन्हें कोई और बच्चा सिर्फ थका हुआ किसान समझ लेता।
अर्जुन ने जल्दी समझ लिया था कि इन लकीरों में थकान से ज़्यादा चिंता लिखी रहती है। अगली फसल कैसी होगी। अगला महीना कैसे चलेगा। बच्चों की पढ़ाई का खर्चा कहाँ से आएगा।
एक बार पिताजी बीमार पड़ गए। उस दिन पहली बार अर्जुन ने खुद खेत की देखभाल की। हाथ काँप रहे थे। मिट्टी से भरा था वह शाम को। माँ ने चुपचाप एक कटोरे में पानी भरा और उसके पाँव उसमें रख दिए। अर्जुन ने उस पानी में अपना चेहरा देखा। बच्चे जैसा नहीं लगता था अब।
शायद उसी दिन वह सच में बड़ा हुआ था।
छोटे सपने और एक मिट्टी का बर्तन:
साल में एक बार मेला आता था। उस दिन यदि हाथ में कुछ पैसे होते तो दोनों भाई मिलकर एक समोसा खाते। सिर्फ एक। वह समोसा उनके लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं था।
घर पर एक मिट्टी का पुराना बर्तन था जिसमें दोनों भाई थोड़े-थोड़े पैसे जमा करते रहे। रात को जब सब सो जाते, वह बर्तन निकलता और उसे हिलाते। वह आवाज़ उनके लिए संगीत थी। वह बर्तन सपनों की गुल्लक था, और वह सपने फिर से भरने की ही सीख देता था।
यह गरीबी सिर्फ एक पृष्ठभूमि नहीं है फैलहा में। यह एक पात्र है। एक ऐसा किरदार जो अर्जुन को तोड़ने की कोशिश करता है और हारने से इनकार करता है।
फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और उन हाथ की दरारों को महसूस करें जिन्होंने एक प्राध्यापक बनाया।


