बिहार के एक गाँव से विश्वविद्यालय विभागाध्यक्ष तक: प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू की वह यात्रा जो “फैलहा” बन गई 

कुछ लोग दुनिया में एक नाम लेकर आते हैं। 

अर्जुन शर्मा एक ऐसा नाम था जो उसे दिया गया था। फैलहा एक ऐसा नाम था जो दुनिया ने दे दिया था। 

दरभंगा के एक छोटे से गाँव में, जहाँ मिट्टी के घर थे, खपरैल की छतें थीं, और बरसात में छत का पानी सीधे बिस्तर पर टपकता था, एक लड़का पैदा हुआ जिसका जन्मदिन भी किसी को ठीक से याद नहीं था। कुछ लोग कहते पंद्रह जून, कुछ पंद्रह जुलाई। कुछ उन्नीस सौ इक्यासी, कुछ उन्नीस सौ बयासी। स्कूल के फॉर्म में अलग-अलग तारीखें लिखी जाती थीं। एक बार जब कक्षा में प्रपत्र भरना था, तो उन्नीस जनवरी लिख दी गई, सिर्फ इसलिए कि उस हिसाब से वह दसवीं की परीक्षा में बैठने की आयु पूरी कर सकता था। 

उसी आदमी का आज नाम है प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू। सहायक प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष, विवेकानंद ग्लोबल विश्वविद्यालय, जयपुर। 

उनकी पुस्तक फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद उन्हीं तीस वर्षों की कहानी है। गाँव की मिट्टी से शुरू होकर अमेरिका तक पहुँची एक यात्रा। और सीधे-सीधे यह किताब उन लोगों के लिए लिखी गई है जो कभी भी गिरने के बाद उठना नहीं भूले। 

फैलहा नाम कहाँ से आया और क्यों यह सिर्फ एक शब्द नहीं था: 

वह एक ऐसे इलाके से आते हैं जहाँ लोग इंसान को नीचा दिखाने के लिए शब्द तोड़-मरोड़ देते हैं। फेल को फैलहा बना दिया गया। उनका असली नाम सिद्धार्थ था, जो लोगों ने बिगाड़कर रुजुआ कर दिया। यह सिर्फ मज़ाक नहीं था। यह उनके आत्म-सम्मान पर एक गहरा घाव था। 

लेकिन प्रो. राजू ने इस शब्द को अपनी ज़िंदगी की दिशा बना लिया। जिस अपमान ने उनके हृदय को तोड़ा, उसी ने उनके भीतर दृढ़ता की ज्वाला जला दी। वह यह साबित करना चाहते थे कि फैलहा कहे जाने वाले भी ऊँचाइयों को छू सकते हैं। 

और आज वह साबित हो चुका है। 

वह तीन बातें जो इस पुस्तक को अलग करती हैं: 

पहली बात यह कि यह पुस्तक सिर्फ एक बार में पढ़ी जा सकती है, लेकिन इसके भाव, शब्द और परिस्थितियाँ आत्मसात करने में शायद वर्षों लग जाएँ। तीन सौ पन्ने, तीस वर्षों का संघर्ष, एक सीधा-सीधा आईना। 

दूसरी बात यह कि यह पूरी तरह व्यक्तिगत है। जब एक प्राध्यापक अपनी परेशानियाँ, अपनी असफलताएँ, अपनी भूख और अपना अपमान बिना किसी आवरण के लिखे, तो वह लेखन नहीं रहता, वह स्वीकारोक्ति बन जाता है। और स्वीकारोक्ति हमेशा सिद्धांत से ज़्यादा करीबी लगती है। 

तीसरी और सबसे ज़रूरी बात यह है कि इस पुस्तक में नैतिकता की रफ़्तार नहीं है। यहाँ कोई सरल पाठ नहीं है। यहाँ एक इंसान है जो बार-बार गिरा और बार-बार खड़ा हुआ। सिर्फ इसलिए नहीं कि वह बलशाली था, बल्कि इसलिए कि उसने हार मानने से इनकार किया। 

ज्योतिषी ने क्या कहा था और क्या हुआ: 

गाँव के एक पंडित ने अर्जुन की कुंडली देखी और साफ बोल दिया कि बृहस्पति बहुत कमज़ोर है। पाँचवीं या छठी तक ही पढ़ पाएगा। शुक्र ग्रह खराब है, अपनी ज़िंदगी बर्बाद करेगा, और ज़िंदगी में कुछ नहीं कर पाएगा। 

वह लड़का आज बयालीस साल का है। पीएचडी की उपाधि के साथ। विश्वविद्यालय में विभागाध्यक्ष के रूप में। अमेरिका तक की यात्रा के साथ। 

परिस्थितियाँ किसी इंसान की ऊँचाई तय नहीं करतीं, उसकी सोच करती है। 

फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद अमेज़नफ्लिपकार्टकिंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और उन सबसे मिलें जिन्हें दुनिया ने कभी उठने लायक नहीं समझा। 

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