तेरह घंटे काम किया पर सिर्फ पाँच घंटे काम आए

एक मालिक सुबह नौ से रात दस तक। तेरह घंटे।

पर उनमें दो घंटे सजावट ठीक करने में गए जो कोई और कर सकता था। डेढ़ घंटा किसी आपूर्तिकर्ता से बेनतीजा बहस में जहाँ कुछ निकला नहीं। एक घंटा ऐसे आगंतुक को दिया जो बस देखने आया था, खरीदने का कोई इरादा नहीं।

तेरह में से शायद पाँच घंटों ने सचमुच कुछ आगे बढ़ाया। बाकी आठ थकान पैदा करने वाले, ज़रूरी दिखने वाले, पर असल में ज़रूरी नहीं।

दूसरा मालिक जो आठ घंटे में ज़्यादा करता था:

नसरुद्दीन नरसीदानी अपनी किताब बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल में एक और तस्वीर पेश करते हैं।

दूसरा मालिक। आठ घंटे। हर घंटे की जगह तय। पहले दो ज़रूरी संवाद और योजना। बीच के चार ग्राहक और टीम। आखिरी दो जाँच और कल की तैयारी।

कम वक्त, कहीं ज़्यादा असर। रात को घर जाता है तो थकान नहीं। संतोष होता है कि आज जो करना था वो हुआ।

व्यस्तता सफलता की पहचान नहीं:

यह वो बात है जो कोई नहीं कहना चाहता।

व्यस्तता अक्सर गलत दिशा में खर्च हुई ताकत की निशानी है। जो जितना ज़्यादा व्यस्त दिखता है वो उतना ही ज़्यादा कामयाब नहीं होता।

रिटेल में भागदौड़ और रिटेल में बढ़त दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। और ज़्यादातर दुकानदार भागदौड़ को बढ़त समझ लेते हैं।

उत्पादकता का असली मतलब:

किताब कहती है। उत्पादकता का मतलब है कि आपके हर घंटे का कोई मतलब हो। आपका हर काम किसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा हो। और जो वक्त आप लगा रहे हैं उसका कोई नतीजा हो।

यह एक बहुत छोटा पर बहुत ज़रूरी बदलाव है। हर सुबह यह पूछिए। आज मुझे कौन से तीन काम ज़रूर करने हैं जो सिर्फ मैं कर सकता हूँ? और बाकी सब किसे सौंप सकता हूँ?

यह सवाल तेरह घंटे की थकान को आठ घंटे की संतुष्टि में बदल देता है।

बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल नसरुद्दीन नरसीदानी द्वारा अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और घंटे गिनना बंद करके सिर्फ काम का नतीजा गिनना शुरू करें।

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