अर्जुन एक सफर पर था।
गाँव से कस्बा। कस्बे से शहर। शहर से पुणे। और पुणे की धरती पर एक ऐसा आसमान था जो पहले कभी इतना बड़ा नहीं लगा था।
लेकिन फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद का असली चरमोत्कर्ष कोई शहर नहीं है। कोई उपाधि नहीं है। कोई पद नहीं है। इस पुस्तक का असली चरमोत्कर्ष वह भीतरी लड़ाई है जो अर्जुन पुणे में अकेले रात को लड़ता है, जब कोई ताना देने वाला भी नहीं होता, कोई साथ रोकने वाला भी नहीं होता, सिर्फ वह होता है और उसका खुद से किया हुआ वादा।
प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू ने अपनी पुस्तक का आखिरी अध्याय नाम दिया है: शांत मन का अर्जुन। यह सिर्फ एक शीर्षक नहीं है। यह एक मनोदशा है जो एक इंसान दशकों की तकलीफ के बाद पाता है।
वह बात जो प्रो. राजू ने पूरी पुस्तक में एक बार भी नहीं छुपाई:
बहुत-सी प्रेरणा देने वाली पुस्तकों में असफलता को एक सीढ़ी की तरह दिखाया जाता है। साफ-सुथरा। उद्देश्यपूर्ण। जैसे वह सबकुछ सिर्फ इसी लिए हुआ था कि पाठक को एक अच्छा सुखांत मिले।
फैलहा ऐसा नहीं करती।
इस पुस्तक में दर्द का कोई उद्देश्य नहीं दिया जाता तत्काल रूप में। वहाँ गरीबी है, और सिर्फ गरीबी है, कोई पाठ नहीं। वहाँ ताने हैं और वह ताने सिर्फ दर्द देते हैं, कोई तत्काल परिवर्तन नहीं। वहाँ रात है और वह रात सिर्फ अकेली है, कोई सरल उत्तर नहीं।
लेकिन धीरे-धीरे, पूरी पुस्तक में एक चीज़ होती रहती है। एक आदमी उठता रहता है। बिना किसी नाटकीय कारण के। सिर्फ इसलिए कि वह उठना नहीं छोड़ सकता।
अपने आप से अपने आप तक की आज़ादी की लड़ाई:
पुणे में अर्जुन का एक दृश्य है। वह अकेला है। बाहर कोई नहीं जो उसे रोक सके। कोई ताना देने वाला भी नहीं। और उसी अकेलेपन में वह सबसे बड़ी लड़ाई लड़ता है। खुद से। अपनी ही उस आवाज़ से जो कहती रहती है, छोड़ दे, बहुत हो गया।
यही वह पल है जब फैलहा एक व्यक्तिगत कहानी से अधिक बन जाती है। यहाँ पाठक को अपनी खुद की कोई रात याद आती है। कोई वक्त याद आता है जब दुनिया नहीं, खुद अपना ही मन शत्रु बन गया था।
और प्रो. राजू का अर्जुन बताता है कि उस रात भी उठना होता है।
वह पाँच बातें जो पूरी पुस्तक एक पाठक को देती है:
पहली बात: परिस्थिति किसी इंसान की पहचान नहीं होती। नगर छोटा हो या बड़ा, घर पक्का हो या मिट्टी का, जन्मतिथि ठीक से याद हो या न हो, यह सब जीवन की ऊँचाई तय नहीं करते।
दूसरी बात: भूख सिर्फ रोटी की नहीं होती। आत्म-सम्मान की भूख सबसे बड़ी होती है। जब तक वह नहीं मिलती, कोई भी रोटी पूरी नहीं लगती।
तीसरी बात: अपमान को सपनों की खाद बनाना एक कौशल है। वह कौशल सीखना पड़ता है। सीखने की जगह वह अकेली रातें हैं जब सब सो जाते हैं और एक इंसान छत पर आसमान देखता है।
चौथी बात: बार-बार टूटा हुआ इंसान अक्सर वह रूप लिए बैठता है जो बाहरों को दिख नहीं सकता। उनका जो नीचे से उठना है, वह भव्य नहीं होता। वह धीमा, शांत और गहरे रूप से व्यक्तिगत होता है।
पाँचवीं बात: कोई भी फैलहा है जब तक वह उठने की ज़िद नहीं छोड़ता। ज़िद का मतलब यहाँ क्रोध नहीं। ज़िद का मतलब है एक ऐसा संकल्प जो तुमने सिर्फ अपने आप से किया है, किसी और के लिए नहीं।
फैलहा: हार से जन्मी जीत की ज़िद अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और अपनी खुद की वह रात याद करें जब उठने की वजह सिर्फ आप थे।


