“पहले वाला ज़माना अच्छा था। ग्राहक एक जगह टिकता था।”
यह बात नसरुद्दीन नरसीदानी ने भी सुनी है। बहुत बार।
और उनका जवाब बहुत सीधा है। जब वो एक जगह टिकता था तब उसके पास और कोई चुनाव भी तो नहीं था।
चुनाव ज़्यादा हैं। यह सच है। पर वफादारी खत्म नहीं हुई। बस उसकी शर्त बदल गई।
वफादारी अब कमानी पड़ती है:
नसरुद्दीन नरसीदानी ने बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल में यह बात एक बहुत छोटे उदाहरण से कही है।
कोई खरीदकर गया। अगले दिन छोटा-सा इश्यू आया। फोन किया। फोन उठा। बात सुनी गई। हल साफ मिला।
बस। इतना काफी है कि अगली बार भी वो वहीं आए।
अब उल्टा सोचिए। फोन नहीं उठा। या उठा तो टाला गया। चोट सामान से नहीं लगती। बताई से लगती है। और वो चोट याद रहती है।
ग्राहक भाग नहीं रहा। वो बस यह देख रहा है। बात सुनी जाएगी या नहीं। दिक्कत आई तो कोई खड़ा मिलेगा या नहीं।
आज भी वफादार ग्राहक हैं:
किताब में यह बात बड़े विश्वास के साथ कही गई है।
आज भी ऐसे ग्राहक हैं जो सालों से एक ही दुकान पर जाते हैं। न कभी रेट पूछते हैं। न कभी तुलना करते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि वहाँ उनकी बात सुनी जाएगी और कोई दिक्कत आई तो फोन उठेगा।
यह वफादारी अपने आप नहीं बनी। इसके पीछे बरसों का लगातार अच्छा व्यवहार है। छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना है। और ग्राहक को यह एहसास दिलाना है कि वो सिर्फ एक बिल नहीं बल्कि एक रिश्ता है।
वफादारी का रिश्ता दोनों तरफ से होता है:
अगर आप ग्राहक के साथ ईमानदार हैं, उसकी ज़रूरत को समझते हैं, और मुश्किल वक्त में उसके साथ खड़े रहते हैं, तो वो भी आपके मुश्किल वक्त में आपको नहीं छोड़ता।
और यही वो ताकत है जो किसी भी बड़े विज्ञापन से ज़्यादा असरदार है।
बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल नसरुद्दीन नरसीदानी द्वारा अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और जानें कि वफादारी कैसे माँगी नहीं जाती, कैसे कमाई जाती है।
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