एक ही बाज़ार में दो इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानें खुलीं।
पहली दुकान रोज़ खुलती है, ग्राहक आते हैं, बिक्री होती है। मालिक से पूछा जाए कि आगे क्या योजना है तो जवाब मिलता है। “दुकान चल रही है, बस यही काफी है।”
दूसरी दुकान भी उसी तरह शुरू होती है। फर्क सिर्फ सोच में है। वहाँ शुरुआत से ही कुछ बातें तय हैं। ग्राहकों का रिकॉर्ड रखा जाएगा। हर साल नए उत्पाद जोड़े जाएँगे। दो साल में ऑनलाइन बिक्री शुरू की जाएगी। टीम को धीरे-धीरे प्रशिक्षित किया जाएगा।
पाँच साल बाद तस्वीर बदल जाती है।
पहली दुकान अब भी वहीं है, उसी दायरे में।
दूसरी दुकान के ग्राहक बढ़ चुके हैं, ऑनलाइन ऑर्डर आने लगे हैं, और काम का दायरा बड़ा हो गया है।
नसरुद्दीन नरसीदानी जो बात कहते हैं:
बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल में यह उदाहरण इसलिए नहीं है कि दूसरी दुकान ने कोई बड़ा जादू किया। यह इसलिए है कि फर्क मेहनत में कम, दिशा में ज़्यादा था।
जहाँ मंज़िल साफ होती है वहाँ हर दिन का काम उसी ओर बढ़ता है।
और जहाँ मंज़िल तय नहीं होती वहाँ मेहनत भी अक्सर बस दिन गुज़ारने में लग जाती है।
दृष्टि रखना कोई कठिन काम नहीं:
किताब एक बहुत सीधा तरीका बताती है।
एक शांत शाम को बैठकर सोचिए। तीन साल बाद मैं अपनी दुकान को कहाँ देखना चाहता हूँ? क्या बदलना चाहता हूँ? क्या जोड़ना चाहता हूँ? क्या छोड़ना चाहता हूँ?
और फिर उन बातों को एक कागज़ पर लिख लीजिए। उस कागज़ को ऐसी जगह रखिए जहाँ रोज़ नज़र पड़े।
बस इतना। यही दृष्टि है।
जिसे पता नहीं कि जाना कहाँ है उसकी कोशिशें धीरे-धीरे भटकाव बन जाती हैं। और भटकाव इतना खामोश होता है कि साल बीत जाते हैं पर इंसान वहीं खड़ा रहता है जहाँ से चला था।
बड़ा रिटेल विथ छोटा विटेल नसरुद्दीन नरसीदानी द्वारा अमेज़न, फ्लिपकार्ट, किंडल और गूगल बुक्स पर उपलब्ध है। अभी खरीदें और वो दिशा तय करें जो आपकी दुकान को पाँच साल में कहीं और खड़ा करे।
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