प्रो. (डॉ.) सिद्धार्थ राजू एक ऐसे लेखक, शिक्षाविद और विचारक हैं, जिन्होंने जीवन के संघर्षों को अत्यंत निकट से देखा और गहराई से अनुभूत किया है। उनका लेखन मात्र शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभवों, संवेदनाओं और प्रेरणाओं की सजीव अभिव्यक्ति है। उन्होंने अपने जीवन में जिन कठिनाइयों, विषमताओं और सामाजिक असमानताओं का सामना किया, वही उनके लेखन की मूल प्रेरणा और आधार बनीं। “फेलहा” जैसी कृति केवल एक साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि उनके आत्मानुभवों की सशक्त अभिव्यक्ति है, जो यथार्थ, संवेदना और भावनात्मक गहराई का प्रभावशाली संगम प्रस्तुत करती है।

डॉ. सिद्धार्थ राजू का जन्म वर्ष 1982 में बिहार राज्य के दरभंगा जनपद के कसरौर ग्राम में एक साधारण ग्रामीण परिवेश में हुआ। यह क्षेत्र पौराणिक विदेह राज्य की पुण्यभूमि माना जाता है, जिसे माता सीता के मायके और मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के ससुराल के रूप में विशेष धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। यह ग्राम आधुनिक मिथिला क्षेत्र में स्थित है, जो महाकवि विद्यापति और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे महान साहित्यकारों की जन्मभूमि के मध्यवर्ती क्षेत्र में आता है। उनका जन्म श्री. विश्वमोहन झा एवं श्रीमती. सुनैना देवी के सुपुत्र के रूप में हुआ। यह ग्राम कवि नागार्जुन के पैतृक गांव के समीप स्थित है। उनके जन्मकाल में यह क्षेत्र शिक्षा, संसाधनों और अवसरों की दृष्टि से अत्यंत सीमित था। इसके बावजूद, उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के सरकारी विद्यालय से प्रारंभ होकर देश के विभिन्न नगरों एवं राज्यों से गुजरती हुई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका तक पहुँची। यह यात्रा उनके सतत संघर्ष, अथक परिश्रम और दृढ़ संकल्प का जीवंत प्रमाण है।

शिक्षा के क्षेत्र में डॉ. प्रो. सिद्धार्थ राजू का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वे केवल एक उत्कृष्ट अध्यापक ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले प्रेरक मार्गदर्शक भी रहे हैं। एक प्रोफेसर के रूप में उन्होंने सदैव यह संदेश दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन को गहराई से समझना, मानवीय संवेदनाओं को विकसित करना और समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है। वर्तमान में वे विवेकानंदा ग्लोबल विश्वविद्यालय, जयपुर में एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं।

“फेलहा” उनके साहित्यिक जीवन की एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह कृति इस सत्य को स्थापित करती है कि संघर्ष ही सफलता की जननी है। इस रचना के माध्यम से डॉ. राजू ने समाज को न केवल एक प्रेरणादायक कथा प्रदान की, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, वास्तविक विजेता वही होता है जो हार मानने से इनकार करता है। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित किया है कि असफलता, सफल व्यक्तियों के लिए प्रथम प्रयास होती है, जबकि असफल व्यक्तियों के लिए वही अंतिम परिणाम बन जाती है।